ज़ायके का सफ़र : लखनऊ
May 2nd, 2007 by jitu | 9 Comments
सबसे पहले तो मै धन्यवाद करना चाहूंगा अपने दोस्त और साथी ब्लॉगर अमित गुप्ता का जिन्होने इस ग्रुप ब्लॉग की परिकल्पना की। हिन्दी मे हर तरह के ब्लॉग लिखे जा रहे है, लेकिन अभी भी कुछ विषय आधारित ब्लॉग कम ही है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस समूह ब्लॉग को बनाया गया है, जिसका नाम है स्पाइसी आइस। अब ये नाम अमित ने क्यों रखा ये तो वही बताएंगे, अलबत्ता हम इतना जरुर बताना चाहेंगे कि इस ब्लॉग मे हम आपके सामने परोसेंगे लजीज शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजनों की चटपटी और मसालेदार बातें। इतना ही नही हम आपको ले चलेंगे दुनिया भर की बेहतरीन वाइन और ड्रिंक्स की महफिल में। इसके अलावा आपके इलाके के अच्छे रेस्टोरेंट के मीनू और उसके खाने पर हमारा रिव्यू पढना ना भूलें। इसलिए खाने पीने के शौंकीन लोग बैयार हो जाएं और हमारे साथ हो लें।
जब बात फूड और वाइन की हो, तो हम पीछे कैसे रह सकते है। खाने पीने के लिए दुनिया छान मारी है और वाइन, उसके बिना…इश्श..धीरे से, कोई सुन न ले। सो जनाब खाने पीने की बात सुनकर, हम भी बन गए इस ग्रुप ब्लॉग का अहम हिस्सा। इसमे हम अकेले नही है, भारत, ब्रिटेन, अमरीका, इटली और दूसरे देशों के खाते पीते ब्लॉगर भी हमारे साथ साथ इस फूड और वाइन के ग्रुप ब्लॉग मे लगातार लिखते रहेंगे। अभी तो हमने हफ़्ते मे एक पोस्ट लिखने का मन बनाया है, आगे देखते है। तो आइए जनाबे-आली, शुरु करते है जायके का हसीन सफ़र।
भई हम तो है परदेस में, हम शामे अवध सुबहे बनारस छोड़ आए। भले ही हम छोड़ आए वो गलिया वो कूंचे, लेकिन आज भी लखनऊ के टुंडे नवाब के लजीज कबाब का स्वाद दिलो दिमाग पर छाया हुआ है। कहते शामे अवध की बात ही कुछ और होती है, एकदम दुरुस्त है जनाब। लखनऊ हमेशा से ही लजीज पकवानों के लिए मशहूर रहा है। सबसे ज्यादा प्रसिद्दि मिली है टुंडे नवाब के कबाब को। क्या कहा? आपने कभी टुंडे नवाब के कबाब नही खाएं है। ओह ओह! फिर तो आपने अपने साथ बहुत नाइन्साफ़ी करी भई। चौक की घुमावदार गलियों मे से एक गली मे मौजूद है टुंडे नवाब की यह १०० साल पुरानी दुकान।
कबाब की शुरुवात
टुंडे नवाब के वालिद साहब ( या उनके वालिद) लगभग दो सौ साल पहले भोपाल से लखनऊ तशरीफ़ लाए थे। लखनऊ के नवाब के यहाँ शाही खानसामा थे। नवाब साहब लजीज खाने के बड़े शौकीन थे। जमाना बीत गए, तो मुँह के दाँत भी अल्लाह को प्यारे हो गए, लेकिन कमबख्त गोश्त का जो स्वाद मुँह लगा वो कैसे छूटता। खानसामा को बुलाया गया और फरमाइश बताई गयी। तो जनाब खानसामा ने गोश्त को बारीक बारीक पीसकर उसमे पपीता और मसाले डालकर और भून कर जब नवाब साहब की खिदमत मे पेश किया। नवाब साहब ने जैसे ही इसको अपने मुँह मे रखा तो मुँह में रखते ही घुल गया। बस जी वही के वही, नवाब साहब ने इसका नाम रख दिया ‘गलावटी कबाब‘। बस जनाब तब का दिन है और अब तक, गलावटी (बिगड़ते बिगड़ते गिलावटी) कबाब किसी की जुबां से नही उतरा। नवाब साहब चले गए, टुंडे मियां के वालिद साहब भी जन्नत नशीं हो गए, लेकिन गिलावटी कबाब का स्वाद वैसा का वैसा ही है।

आइए अब बताएं कि इनकी दुकान का नाम टुंडे नवाब क्यों पड़ा। टुंडे का मतलब होता है लूला/विकलांग या जिसका हाथ कटा हुआ। हुआ यूं कि इस दुकान के मालिक साहब पंतगबाजी के बड़े शौंकीन हुआ करते थे। बस जनाब पंतगबाजी के शौंक ने उनके हाथ की हड्डियां तोड़ दी, जिसको बाद मे कटवाना पड़ा। लेकिन जनाब दुकान पर वैसे ही हनक के साथ बैठा करते थे। बस तब से दुकान का नाम टुंडे नवाब की दुकान पड़ गया। इन कबाबों मे छोटे (बकरे) और बडे (भैंसे) दोनो का इस्तेमाल होता है। वैसे आजकल जनता की फरमाइश पर चिकन के कबाब भी पेश किए जा रहे है। इसको बनाने का फार्मूला बहुत गोपनीय है, इसमे सैकड़ो तरह के मसाले डाले जाते है, अपच की शिकायत ना हो इसके लिए हर्रे भी डाली जाती है। कबाब जनता के सामने ही सेंके जाते है, अगर आप वहाँ खड़े हो जाएं तो आपके मुँह मे पानी ना आए तो कहिएगा। जब टुंडे नवाब ने दुकान खोली थी, तब एक पैसे मे दस कबाब मिलते थे, आज शायद एक प्लेट का दस/बीस रुपए होता है। आज भी टुंडे नवाब की दुकान मुनाफ़ा कमाने के लिए नही, बल्कि बुजुर्गों की शुरु की गयी रवायत को निभाने के लिए चल रही है । इनका मानना है कि मुनाफ़ा नमक की तरह होना चाहिए। एक और बात, इनके यहाँ खाने आने वालों में बड़ी तादाद फैमिली वालों की होती है। क्या हिंदू क्या मुसलमान, सभी एक साथ बैठकर खाते है। यही तो है अवध की गंगा जमुनी तहज़ीब।
टुंडे नवाब की प्रसिद्दि का आलम कुछ इस तरह का है कि जितने भी हाई प्रोफ़ाइल लोग लखनऊ आते है तो टुंडे नवाब के कबाब खाए बिना नही रहते। भले ही वो फिल्म स्टार हो, क्रिकेट स्टार, राजनेता या हाई प्रोफ़ाइल वीआईपी। आप भी जब कभी लखनऊ आएं तो टुंडे नवाब के कबाब जरुर खाइएगा। तो जनाब कब आ रहे है लखनऊ?
जाते जाते आपको कुछ अलग तरह के शामी कबाब बनाने की रेसिपी बताते चलें।

सामग्री:
१/२ किलोग्राम मीट का कीमा, ( आप यदि चाहें तो मुर्गे का कीमा भी प्रयोग कर सकते है)
१२० ग्राम चने की दाल,
८० ग्राम बारीक कटा हुआ प्याज
कटी हुई हरी मिर्च (यदि तीखापन चाहें तो)
बारीक कटी हुई अदरक और लहसुन
१० ग्राम कार्नफ्लोर (ज्यादा महीना पिसा हुआ हो तो बेहतर रहेगा)
१ छोटा चम्मच नमक, (स्वादानुसार)
कटा हुआ पुदीना
लौंग, दालचीनी, इलायची (चार चार पीस काफी रहेंगे)
१ अंडा,
बंद गोभी के पत्ते (कुछ पत्ते)
१/२ छोटा चम्मच गरम मसाला पावडर
तलने के लिए पर्याप्त तेल या घी।
बनाने की विधि:
नमक, कीमा, दाल, अदरक, लहसुन, लौंग, दालचीनी व हरी इलायची को मिलाकर थोड़े पानी के साथ उबालें। कीमा गलने के बाद, पानी को सुखा दें। अंडे को फैंट लें। कीमे को ठंडा होने पर अंडे, प्याज, पुदीना, गरम मसाला और कार्नफ़्लोर के साथ गूँध लें। छोटी छोटी गोलियां तैयार कर लें और उन्हे चपटा कर लें। कड़ाही मे तेल गरम करें और कबाब को हल्का घूरा होने तक तल लें। तले हुए कबाब को प्लेट पर बंद गोभी के पत्तों के ऊपर सजाएं, प्याज, नीबू और अन्य सलाद के साथ परोसे। कबाब के साथ धनिया पुदीने की हरी चटनी बहुत मुफीद रहती है।
साथ मे पीने के लिए ………अच्छा चलिए उसके बारे मे बात, अगली पोस्ट में करेंगे।
आहा, मेरे मुँह में तो पढ़ के ही पानी आ गया!
पर गर्मियों में अपन तो मांसाहार से दूर ही रहने की कोशिश करते हैं। 
[…] पधारिए स्पाइसी आइस पर। मैने भी अपने पहले लेख से शुरुवात कर दी है। इस नए प्रयोग पर […]
बहुत बधाई इस सामूहिक प्रयास के लिये.
मूंह में पानी आ गया. बस, शामी कबाब बनाने की तैयारी शुरु कर दी है.
बहुत बढ़िया पहल. मजा आ गया.
बहुत अच्छी शुरुवात!!
हे हे ढाबे की शुरुआत अच्छी की है, कुछ हम शाकाहारियों के लिए भी बंदोबस्त किया जाए।
क्यों श्रीश बाबू, पिछली पोस्ट शाकाहारियों के लिए ही है, एक को छोड़ सभी व्यंजन उसमें शाकाहारी ही हैं।
[…] और आश्चर्य, घोर आश्चर्य, जीतू भाई की टुन्डेनवाब वाली पोस्ट एकदम मस्त तरीके से दिखाई दे रही थी!!! […]
मैं आमतौर पर मांसाहार नहीं लेता. मसाले में मज़ा होता है मांस में नहीं. लिहाज़ा मसाला सब्ज़ी मे डलवा लेता हूं. हो गया मेरा कटहल तैयार.. जो मटन का मज़ा देगा और बकरा मज़ा करेगा.
aadab
ab tund bhi karobari ho gaye han.
unki sahara ganj men khuli nai shop fast food jaise hai